भक्त प्रहलाद, बिश्नोई पंथ व कवि गोपाल विरचित ‘प्रहलाद चरित्र’ - स्वामी कृष्णानन्द आचार्य

 भक्त प्रहलाद, बिश्नोई पंथ व कवि गोपाल विरचित ‘प्रहलाद चरित्र’ - स्वामी कृष्णानन्द आचार्य

भक्त प्रहलाद, बिश्नोई पंथ व कवि गोपाल विरचित ‘प्रहलाद चरित्र’ - स्वामी कृष्णानन्द आचार्य



गुरु जाम्भोजी ने भी शब्दवाणी में प्रहलाद का बड़े ही आदर से नाम लिया है और बिश्नोई पंथ का मूल आधार प्रहलाद को ही स्वीकार किया है तथा अपने आने का मुख्य कारण भी प्रहलाद को ही माना है।

  •  शब्द सं. 111 में कहा है- ‘‘म्हे बाचा कीवी प्रहलादे सूं, सूचेलो गुरु लाजै।’’
  • शब्द सं. 58 में कहा है- ‘‘पहलू प्रहलादा आप पतलीयो, दूजा काजै काम बिटलियो, खेत मुक्तले पंच करोड़ी, सो प्रहलादा गुरु की बाचा बहियो। ताका शिखर अपारूं, ताको तो वैकुण्ठे वासो।‘‘
  • शब्द सं. 97 - ‘‘पंच करोड़ी ले प्रहलाद उतरियो, जिन खरतर कीवी कमाई।’’
  • शब्द सं. 118 - ‘‘सुरगा हूंते शिम्भू आयो, कहो कुणां के काजै। नर निरहारी एकलवाई, परगट जोत बिराजै। प्रहलादा सूं बाचा कीवी, आयो बारां काजै। बारा में सूं एक घटै तो, सुचेलो गुरु लाजै।’’ 
  • कलश पूजा में भी कहा है-सत्रह लाख अठाइस हजार सतयुग प्रमाण। सतयुग के पहरे में, सोने को घाट, सोने को पा, सोने को कलश, सोने को टको, पांच क्रोड़या के मुखी गुरु श्री प्रहलाद जी महाराज ने कलश थाप्यो।’’ 

गुरु जम्भेश्वर जी की दिव्य अलौकिक वाणी के अनुसार यह बात स्पष्ट रूपेण समझ में आ जाती है कि जाम्भोजी ने अपने को यहां मरूभूमि में आने का मुख्य कारण सतयुग में भक्त प्रहलाद से किये हुऐ वचनों को पूर्ण करने के लिये यहां मृत्यु लोक में आनाबताया है। भक्त प्रहलाद को वचन क्या और क्यों दिये थे इस वार्ता को समझने के लिये हमें प्रहलाद चरित्र अवश्य ही पढ़ना चाहिये। यह प्रहलाद चरित्र इस समय केशोजी द्वारा रचित एवं उदोजी तथा साहबराम जी द्वारा रचित उपलब्ध हैं। इनमें विस्तृत और साहित्यिक रचना केशोजी की ही प्रसिह् रही है। केवल जाम्भाणी साहित्य में ही प्रहलाद चरित्र वर्णित नहीं है अन्य ग्रन्थों में भी भागवत आदि पुराणों में भी प्रहलाद की कथा विस्तार से वर्णित हुई है किन्तु जो प्रहलाद के सम्बन्ध में जाम्भोजी ने विरल सिह्ान्त कहा है और पीछे जाम्भाणी कवियों ने जिस ढ़ंग से प्रहलाद चरित्र का वर्णन किया है वह अन्यत्र दुर्लभ है अन्य कवियों की कविता तो कल्पना से निसृत हो सकती है किन्तु जाम्भोजी महाराज नें स्वयं यथार्थ वक्ता के रूप में अपनी स्वयं की वार्ता अपने द्वारा प्रगट की है जो प्रत्यक्ष देखा है वही बातें कही है इसलिये यथार्थ एवं सत्य है स्वयं गुरु देव ने कहा भी है-‘‘म्हे भूल न भाख्या थूलूं।‘‘ जम्भेश्वर जी कहते है कि मैंने सतयुग में इसी होली के दिन ही प्रहलाद को शिष्य मानकर वचन दिया था कि मैं तुम्हारे बिछुड़े हुए तैतीस करोड़ अनुयायियों का आगे चार युगों में उद्हार रूंगा। इस प्रथम सतयुग में तुम्हारे साथ पांच करोड़ का उद्हार होगा। त्रेता में सत्यवादी हरिशचन्द्र के साथ सात करोड़ का उद्हार होगा ,द्वापर में धर्मराज युधिष्ठिर के साथ नौ करोड़ का उद्हार होगा और और कलयुग में मैं स्वयं ही आउंगा तुम्हारे शेष बारह करोड़ का उद्हार करूंगा। ऐसा वचन नृसिंह रूप में भगवान नें स्वयं अवतार लेकर भक्त प्रहलाद को दिया था। उन्हीं वचनों को पूरा करने के लिये इस कलयुग में गुरु जाम्भोजी कहते है कि मैं नृसिंह रूपधारण कर्ता स्वयं विष्णु यहां पर आया हूं यदि इनमें से कोई एक भी पीछे रह जाता है तो ‘‘सू चेलो गुरु लाजै’’ अच्छा शिष्य और गुरु दोनों को ही लज्जित होना पड़ता है। होली के दिन यानि होलिका अग्नि में जल गई थी,प्रहलाद सकुशल अग्नि में से वापिस लौट आया था उसी दिन यह निर्णय हो गया था कि कौन प्रहलाद पंथी है और कौन हिरण्यकश्यप पंथी है। कौन देव मार्ग का अनुयायी और कौन राक्षस मार्गी है। जो प्रहलाद पंथी थे उन्हें प्रहलाद ने कलश स्थापना करके पाहल बनाकर पवित्र अमृतजल हाथ में देकर संकल्प करवाया था कि हम भगवान विष्णु के उपासक है और रहेंगे। दैत्य संस्कृति का परित्याग करके देवता संस्कृति को अपनायेंगे और प्रहलाद अनुयायी बिश्नोई पंथी बनेंगे। यही वह होली का दिन था उसी दिन प्रहलाद पंथ की स्थापना हुई थी। वह सतयुग था उसी युगीन हम लोग बीच के युगों को पार करते हुऐ इस समय कलयुग में पहुंचे है। युग चाहे कितने ही बदल जाये किन्तु जीवों के अपने संस्कार अनेक जन्मों में भी साथ ही रहते है इस बात को हम नहीं जानते किन्तु गुरु जाम्भोजी जानते थे इसलिये तो कहा था ‘‘जिनकी जात पिछाणौं ,खोज लहां धुर खोजूं’’ कहते है कि मैं उन जीवों की जाति पहचानता हूं। उन सतयुगीन जीवों को मैनें खोज लिया है वे इस कलयुग में मुक्ति को प्राप्त होनें के अधिकारी है। इन्हीं लोगों को मैनें सतयुग में वचन दिया था तीन युगों में उन-उन लोगों को तो मैनें ही संभाल लिया था ‘‘तेउ तो उरवारे थाणौ ,पार पहुंचन हारा’’ वे लोग इसी पृथ्वी पर ही थे ,पार पहुंचने की योग्यता थी, उन्हें पार पहुंचा दिया है। यहां पर यह विचारणीय है कि अब इस समय हमारा क्या होगा? उन बारह करोड़ों का उह्ार मुक्ति का वचन जाम्भोजी ने कलयुग में दिया था, वे पूरे बारह करोड़ जाम्भोजी के साथ ही चले गये? कहा भी हे- ‘‘बारह थाप घणां न ठाहर’’ बारह करोड़ की स्थापना यानि बिश्नोई पंथ की स्थापना हो जायेगी तो मैं ज्यादा दिन यहां मरूभूमि में नहीं ठहरूंगा। वैसा हुआ भी है जब पूर्णतया पंथ की स्थापना हो गई तो संवत् 1593 (सन् 1536) में यहां से अपनी लीला समेट ली ‘‘ओल्हे हुआ अलेख’’ वह अलेख पुरूष मिंगसर वदि नवमी को लालासर की साथरी में ओल्हे हो गये यानि आंखों से ओझल हो गये। दिखाई नहीं दिये। गये कहां यह तो किसी को पता नहीं चला किन्तु उन्होंनें ही संकेत दे दिया था कि ‘‘गुरु आसन सम्भराथले ,कहे सतगुरु भूल मत जाइयो ,पड़ोला अभै दोजखै।’’ 

सत्रहवीं शताब्दी के सिह् कवि केसोजी के समकालीन ‘‘गोपाल‘‘ द्वारा रचित प्रहलाद चरित्र है। प्रहलाद की महता को स्वीकार करते हुऐ सर्वप्रथम केसोजी ने वृह्द एवं काव्य गुणों से विभूषित प्रहलाद चरित्र की रचना की थी। उन्हीं के समकालीन कवि गोपाल जी ने भी प्रहलाद के गुणों एवं चरित्र से आकृष्ट होकर दूसरे प्रहलाद चिरत की रचना की है। तीसरी रचना उदोजी अड़िंग द्वारा की गई है और चैथी रचना हरिचन्द जी ढ़ुकिया द्वारा की गई है तथा पांचवीं रचना साहबराम जी ने जम्भसार में वर्णित की है। यहां पर गोपाल द्वारा रचित प्रहलाद चरित्र के

बारे में विचार किया जा रहा है। प्रथम यह कथा भागवत पुराण में विस्तार से उपलबध है, उसी का सहारा लेकर कवि ने प्रहलाद के सबन्ध में अपनी भावना प्रगट करते हुऐ स्वयं को धन्य माना है। जाम्भाणी साहित्य परंपरा में सभी कवियों के अनुरूप ही प्रथम ‘‘श्री विसन जी सत

सही‘‘अथ प्रहलाद चिरत‘‘ इसी परंपरा का पालन गोपाल जी ने भी किया है। प्रथम प्रणाम कवि हरि एवं गुरु को करते हुऐ उनसे आज्ञा लेकर भक्त प्रहलाद की भक्ति का विस्तार भागवत की प्रमाणिकता से प्रारम्भ करते है जो कवि के जाभाणी संत होने का प्रमाण है। 

प्रथम सीस हरि गुर को नाउं ,कहुं कथा जो आज्ञा पाउं।

भक्त भगवंत सुजस विस्तारूं ,किरपा लौकन हृदे धारूं।1।

चार वर्ण, चार ही वेद, चार ही आश्रम ये सभी एक ओंकार का ही विस्तार है। सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार एक ओम से ही हुआ है किन्तु अज्ञानियों नें भेद करके लोगों को जात-पंात ,धर्म-सम्प्रदाय में बांट दिया है। कवि कहता है-

‘‘हिन्दु तुरक कहै हरि दोई ,सतगुरु मिलै ते एकौ होइ।4।

जाम्भोजी सतगुरु हमें मिले तब से हमने हिन्दु-मुसलमान का भेद मिटा दिया है। सभी उसी एक ही की संतान है ,मानव ने ही द्वेत भाव खड़ा किया है। जब तक गुरु की शरण में नहीं जायेंगे, तब तक कैसे अज्ञानता मिटेगी।

चितामणी क्यों मोलि बिकावै, कलप बिरछ काकै घरि जाई।

पारस कहौ कून कूं चाहै ,कामधेनु कुं कौ निरबाहै। 6।

इस प्रकार के उपदेश शंकर ,ब्रह्मादिक आदि देवताओं नें शिष्यों से कहे है गोपाल कहते है कि मैं प्रहलाद के यश का वर्णन करता हूं। जैसा कि प्रहलाद चरित्र की कथा सनकादिकों के विष्णु धाम में प्रवेश से प्रारम्भ होती हे वैसे यहां पर भी भगवान के धाम पर जय विजय से संवाद होता है जय विजय कहते है कि हे बालकों सुनों-बिना पूछे किसी पराये घर में प्रवेश वर्जित है।

‘‘परघर गवन पुछि की कीजै, प्रभु रिसाय उतर क्या दीजै।12।

सनकादिकों नें कहा-हम ही जानै हम ही पहचानें ,प्रभु के निकट सदा सनमानें।13।

आगे की कथा में सनकादिकों नें जयविजय को श्राप दिया और वे दोनों मृत्युलोक में हिरणाक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में जन्म लेकर आये और तीसरे जन्म में मिलने का वरदान प्राप्त किया। यह बात प्रायः सभी कथाओं में मिलती है। वाराह रूप धारण करके हिरणाक्ष को हरि ने मार डाला तब हिरण्यकश्यप ने घोर तपस्या प्रारम्भ कर दी तथा ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करके अजर अमर होकर वापिस लौट आया। जब हिरण्यकश्यप तपस्या को गया था तब पीछे से प्रहलाद की माता को नारद ने भक्ति ज्ञान दिया था। वहीं प्रहलाद ने गर्भ में भक्ति-ज्ञान को स्थिर करके जन्म लिया था। हिरण्यकश्यप ने राक्षस संस्कृति का विस्तार करने की योजना बनाई और देव संस्कृति का विध्वंस करने के उपाय अपने मित्रों से पूछने लगा। इधर प्रहलाद जब पांच वर्ष का हो गया तब उसे पाठशाला में पढ़ने के लिये भेजा गया। वहां पर असुर विद्या पढ़ाने लगे किन्तु प्रहलाद ने उस तरफ कुछ भी ध्यान नहीं दिया किन्तु हरि-ओम नाम की पाटी लिखकर अभ्यास दृढ़ करने लगे।

ओम नामां सी पाटी लिख दीनी, कर सु कर लेखनि कर दीनी।41।

कहै प्रहलाद भुपाल हि जानौ,तुम क्यूं मिथ्या बात बखानों।।

जिन किया उतपति ओंकारा,तीन लोक बहु विध विसतारा।43।

जब विप्र पढ़ाने वाले अपने घर चले गये तब अन्य बालको ने प्रहलाद से पूछा कि आपने यह देव विद्या कहां से प्राप्त की है हम बालक सभी आपके साथ हंै। अपनी कथा हमें बतलावे, प्रहलाद कहने लगा हे बालको सुनों! जिससे आपका जन्म मरण मिट जायेगा। यह ज्ञान से बात बनेगी। यहां संसार में राक्षसी विद्या से कार्य बनने वाला नहीं है।

अन्ध कुंप ग्रह में जो परियो, तो भवसागर कैसे तरिये।48।

विष वनबेल इमृत करि चाहै, विष फल खाय रू अमर उमाहे। लोहै नाव लै कैसे तरिणे, ओरू पाप पखानो भरिए।49।

अगनि ग्रह कैसे सुख सोवै, कुंण भांति सीतलता होव।

पुरब जात पछम यूं आवै, नैन विना मघ कैसे पावै।50।

काम केल कामनि रस रिझै, पाप पसारै मन क्यूं सीझै।

सुत परवार काम की पासी, तन-धन जोबन रहै न जासी।51।

जब लग रोग न ग्रासै भाई,तब लग औषद लहौ न काई।

जब घर जलै तब कूप खनाई,उतम लोक हंसै रै भाई।52।

जब लग पाइ परै नहीं वैरी, तब लग मारग लीजै हैरी।

जब लग रहै नहीं रखवारूं,तब लग भजिए राजकुमारूं। 53।

तातै सब तजि वन में जाइये,साध संगति मिलि हरि गुण गाइये।

इस प्रकार से अनेक उदाहरणों द्वारा प्रहलाद ने अपने मित्र साथियों को समझाया।

एक दिन पिता हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को अपने पास बुलाया और उच्च आसन पर बैठाकर अपने पुत्र से लिखाई पढ़ाई के बारे में पूछने लगा तब प्रहलाद ने इस प्रकार से कहा-हे पिताजी! इस संसार में भक्ति ही सर्वश्रेष्ट जीवन की कला है। यह संसार तो मोह माया अहंता ममता की डोर में बंधा हुआ है यहां तो दुर्गति के अतिरिक्त ओर कुछ भी नहीं है। यह संसार तो प्रपंच है।

रजु के श्रप सकल जुग खायो,सुपनै जगत अवस डहकायौ।

ध्यावत मृग त्रिस्ना के पानी,यो जीव बंध्यो देह अभिमानी।62।

एक नलनी द्रिष्टांत दिखायो,इहि विधि जीव अबंध बंधायो।

छाड़ि देइ तो कौणे बांध्यो, अज्ञान यों करि इष्ट आराध्यो।63।

इस प्रकार की बात हिरण्यकश्यप नें सुनी तो आश्चर्य चकित हो गया और अपनें मंत्रियों को बुलाकर कहने लगा-यह विद्या इस प्रहलाद को किसने सिखाई। मेरे बैरी हरि विष्णु का ध्यान भक्ति दृढ़ करवा दी है। अवश्य ही इन विप्रों ने मेरे पुत्र को बिगाड़ दिया है। इसलिये इनसे वेद छीन लिया जाये। राक्षस ने कहा-हे विप्रों! इस प्रहलाद को वापिस ले जाओ और मेरे बैरी विष्णु का ध्यान भूला दो।  विप्रों ने प्रहलाद को प्रथम पाटी लिखकर दी। उसे प्रहलाद ने कुछ भी ध्यान नहीं दिया। तब विप्रों ने साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति से सिखाया किन्तु सभी व्यर्थ ही गया। बालकों के पूछने पर प्रहलाद ने बतलाया कि मुझे नारद मुनि की संगति मिली हुई है उन्होंने ही मेरी माता को ज्ञान ध्यान के शब्द सुनाये थे। मैनें गर्भवास में ही सभी कुछ सुना था। इस समय नारद जी ही मेरे गुरु है आप लोग भी मैं जैसा कहता हूं वैसा ही करें। शुक्राचार्य के पुत्र संड और मरंक ने हिरण्यकश्यप के पास जाकर अपना सिर झुकाते हुऐ इस प्रकार से कहा-

संडा मरंक पुकारे जाइ, पटकी पाघ असुर के राई।

थारो पुत्र करै विधि ऐसी,वेद पुराण न समझे तैसी।84।

औरू सखा साथ के पाठै, राजनीति के मारग छाड़ै।

तांतै हम कूं दोष न दीजै, जो भावै सो वांकुं कीजै।85।

नगर ढ़ंढ़ोरो फेरियो, सब कोई मारै जाई।

जिन गोपाल प्रहलाद के, एको राम सहाई।86।

प्रहलाद को मारने के लिये अनेक प्रकार की यातनाएं दी गयी किन्तु प्रहलाद भक्त को जिनके सहायक स्वयं विष्णु भगवान हो उसे कौन मार सकता है।

जिन प्रहलाद रहे तब ऐसे, मानों चित्र को दीपक जैसे।

प्रांन रह्यो परमेसर संगा,ताती बाव न लागै अंगा।93।

साचै दिव्य दीजै तहै जैसे, सीतल बहनी होत है तैसे।

यूं सांचै कुं परमेसर राखै, कहां जगत अज्ञानी भाखै।94।

अन्य भी अनेकों उपाय प्रहलाद को मारने के लिये हिरण्यकश्यप ने किये। जैसे - जल में डूबाना, अंध कूप में डालना, सांपों से डसवाना इत्यादि। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद से पूछा कि बेटा! यह बतलाओ कि मरता क्यों नही? प्रहलाद ने कहा पिताजी! मुझे तो एक राम नाम का ही सहारा है ,वही बचाता है। हिरण्यकश्यप ने कहा तो फिर राम नाम लेनें वालों को तो मैं मारता हूं वे मर भी जाते है तब प्रहलाद ने कहा इस प्रकार के नाम लेने में फर्क है इसे समझें-

इमृत कलश भर धरि लीजै,मरि जावै जे मुखां न पीजै।

रोटी पेट भूख नहीं जाई, बिन जल पीये त्रिखा न बुझाई।120।

औषाद रूख आहि घर बारा, विन घस लाये मरै गिंवारा।

राम नाम को ब्योरौ कीजै,दुख नै दुख संतन सुख दीजै।121।

चिंतामनी का दोष न कोई, जो वीछै सो प्रगट होई।

चिंतामनी हरिजी का नामा, जैसी मनसा तैसा कामा।122।

एक दिन होलिका हिरण्यकश्यप की बहन आ गई और अपने भाई से कहने लगी कि भईया क्या बात है जो इस प्रकार से चिंता में दुबला होता जा रहा है। हिरण्यकश्यप ने कहा कि बहना क्या कहूं मेरे दुख का कोई अंत नहीं है। यह तुम्हारा भतीजा प्रहलाद मेरी एक भी बात मानने को तैयार नहीं है। यह तो मुझे मारकर राजा बन सकता है यह मेरे शत्रु विष्णु का नाम लेता है इसे कैसे इस प्रकार के कार्य से निवृत किया जावे। हे बहना! अधिक क्या कहूं यह तो मारने से भी मरता नहीं है। होलिका कहने लगी भईया! तुम जल्दी ही लकड़ी मंगवावो और आग जलाओ। मैं प्रहलाद को

गोदी में लेकर बैठ जाउंगी और जला दूंगी तुम लोग चारों तरफ से सुरक्षा कर देना कहीं अग्नि की ताप से यह भाग न जाये। मैं तो देवता का दिया हुआ वरदान रूप शीतल वस्त्र ओढ़ लूंगी और प्रहलाद को जला दूंगी मैं अग्नि में जल नहीं सकती। हिरण्यकश्यप ने ऐसा ही किया था। जिसके फलस्वरूप होली दहन अब तक हो रहा है। हर बार होलिका जल जाती है प्रहलाद बचकर आ जाता है। यही होलिका बुराइयों को जलाने का अवसर आता है किन्तु बुराई भी तो ऐसी है कि बार बार लौट आती है। आखिर में प्रहलाद को पकड़कर खंभे से बांध दिया, हिरण्यकश्यप स्वयं हाथ में खड़ग लेकर मारने के लिये उद्यत हुआ और पूछा अब बताओ कहां है तुम्हारा भगवान? 

प्रहलाद ने कहा-मोमे तोमे खड़गखम्भ में हरि विन खाली नांह। तब कोप को डराय। 

हे पिताजी वह तो इस आप के खड़ग में है खंभ में है और आप में भी है ,ऐसा कहते ही उस दानव ने खंभे पर प्रहार किया नृसिंह भगवान प्रगट हो गये और हिरण्यकश्यप को मार डाला। मारने से पूर्व उसकी प्रतिज्ञा भी याद दिलाते हुऐ ‘‘नख से उदर विदारै‘‘ नख से पेट चीर डाला और दानव का अन्त कर दिया। जब भगवान नृसिंह ने प्रहलाद के सिर पर हाथ रखा और कहा हे प्रहलाद कुछ वरदान मांगो। तब प्रहलाद ने सर्वप्रथम यही मांगा कि मेरे पिता की दुर्गति न हो ऐसा वरदान दीजिये तथा दूसरा वरदान-

सकल वसुधा को दुख मोहि दीजै, प्राणी जीव सुखी सब कीजै।। 90।।

इन्द्र ब्रह्मा सिव पुरी न भावै, अरथ दरब की कौन चलावै।

प्रहलाद कहने लगा- 

ज्यूं चिंतामनी पै कोडी बांछै, कलप बिरछ तजि कौदूं जांचै।

इहि विध सेवग कछु न चाहे, माता मन ले पुत्र निवाहै।192।

सरप सिंघ माटी अहि दावै, बालक दुखी मात दुख पावै।

मांगन हार न साध कहावै, अंतकाल जाचिग पद पावै।193।

इस प्रकार से भगवान नृसिंह से प्रहलाद ने अपने लिये कुछ भी नहीं मांगा। परोपकाराय ही मांगा। अपने मित्रों के लिये सुख मांगा। अपने पिता की सद्गति मांगी। इसी बात को गुरु जाम्भोजी ने कहा था कि-

‘‘प्रहलादा सूं बाचा कीवी,आयो बारां काजै।

बारां मैं सूं एक घटै, तो सुचेलो गुरु लाजै।’’

गुरुदेव कहते है कि मैनें ही नृसिंह रूप में प्रहलाद को वचन दिया था कि तुम्हारे अपने मित्र सगे सम्बन्धी शिष्य जो तेतीस करोड़ है उनका उह्ार मैं समय-समय पर चार युगों में करूंगा। इसी बात को दर्शाने के लिये कवि गोपाल जी ने यह प्रहलाद चरित्र लिखा था। अब तक यह अप्रकाशित रचना है। जन गोपाल इस कथा को पूर्ण करते हुऐ लिखते है-

अपनी जानें आप गति, और न जाने कोई।

जिन गोपाल फल बीज में, बीज बीज सूं होई।206।

सारदा लिखत अनंत कर, वसुधा कागद होई।

महिमा भगत भगवंत की, क्यूं कर वरणै कोई।207।

मैं मती सारू अपनी, कहीजु घटि घटि बात।

कहे गोपाल सुत हेत कूं, नीकै समझै मात।208।

प्राप्त हस्तलिखित प्रति के अन्त में लिपिकार ने लिखा है-

इति श्री प्रहलाद चिरत ग्रन्थ भगवत जोग प्रताप संपूरणम्। संवत् 1925 रा मिति असाढ़ सुद 8 वार दीतवार लिखत संकरदासेण।।



कृष्णानन्द आचार्य

अध्यक्ष, जांभाणी साहित्य अकादमी

बिश्नोई मन्दिर ऋषिकेश

मो. 09897390866


साभारः अमर ज्योति मार्च 2013

अमर ज्योति पत्रिका ऑनलाइन सदस्यता


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